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आँखों के चराग़ों में उजाले न रहेंगे
आ जाओ कि फिर देखने वाले न रहेंगे
जा शौक़ से लेकिन पलट आने के लिए जा
हम देर तलक ख़ुद को सँभाले न रहेंगे
ऐ ज़ौक़-ए-सफ़र ख़ैर हो नज़दीक है मंज़िल
सब कहते हैं अब पाँव में छाले न रहेंगे
जिन नालों की हो जाएगी ता-दोस्त रसाई
वो सानेहे बन जाएँगे नाले न रहेंगे
मैं तौबा तो कर लूँ मगर इक बात है वाइ’ज़
क्या आज से गर्दिश में पियाले न रहेंगे
क्यों ज़ुल्मत-ए-ग़म से हो ‘ख़ुमार’ इतने परेशान
बादल ये हमेशा ही तो काले न रहेंगे
ख़ुमार बाराबंकवी
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