इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं

by Jan 28, 2026Shayaris

लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं

इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं



मय-कदा ज़र्फ़ के मेआ’र का पैमाना है

ख़ाली शीशों की तरह लोग उछलते क्यूँ हैं



मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए

और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँ हैं



नींद से मेरा तअल्लुक़ ही नहीं बरसों से

ख़्वाब आ आ के मिरी छत पे टहलते क्यूँ हैं



मैं न जुगनू हूँ दिया हूँ न कोई तारा हूँ

रौशनी वाले मिरे नाम से जलते क्यूँ हैं



राहत इंदौरी

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