यहाँ पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता

by Jan 21, 2026Shayaris

किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता

यहाँ पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता



मोहब्बत का सिला ईसार का हासिल नहीं मिलता

वो नज़रें बार-हा मिलती हैं लेकिन दिल नहीं मिलता



तुम्हारा रूठना तम्हीद थी अफ़्साना-ए-ग़म की

ज़माना हो गया हम से मिज़ाज-ए-दिल नहीं मिलता



जहाँ तक देखता हूँ मैं जहाँ तक मैं ने समझा है

कोई तेरे सिवा तारीफ़ के क़ाबिल नहीं मिलता



हरम की मंज़िलें हों या सनम-ख़ाने की राहें हों

ख़ुदा मिलता नहीं जब तक मक़ाम-ए-दिल नहीं मिलता



मुसाफ़िर अपनी मंज़िल पर पहुँच कर चैन पाते हैं

वो मौजें सर पटकती हैं जिन्हें साहिल नहीं मिलता



हम अपना ग़म लिए बैठे हैं उस बज़्म-ए-तरब में भी

किसी नग़्मे से अब ‘मख़मूर’ साज़-ए-दिल नहीं मिलता



मख़मूर देहलवी

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