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दिल बसे थे मगर उजड़ रहे थे
हम मुहब्बत की जंग लड़ रहे थे
इश्क़ के हाथ बुन रहे थे हमें
शक के हाथों से हम उधड़ रहे थे
इश्क़ भी उन दिनों ज़ियादा था
जिन दिनों हम ज़ियादा लड़ रहे थे
जिस्म पर उसके गुल खिले थे जहां
हम वहीं तितलियाँ पकड़ रहे थे
बात ऐसी के कोई बात न थी
हम उसी बात पर झगड़ रहे थे
एक ही दिन में सब नहीं हुआ ख़त्म
हम कई रोज़ से बिछड़ रहे थे
जिसने बर्बाद कर दिया हमको
हम उसी इश्क़ पर अकड़ रहे थे
गाँव में बारिशों का मौसम था
और हम मछलियाँ पकड़ रहे थे
तेरह चौदह बरस की उम्र थी वो
हम उसी उम्र में बिगड़ रहे थे
उसकी मर्ज़ी से चश्मा फूट पड़ा
हम तो बस एड़ियां रगड़ रहे थे
क़ाफ़िले का नसीब हिजरत था
खै़मे इक बार फिर उखड़ रहे थे
शकील आज़मी
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