सेहरा में रह के क़ैस ज़ियादा मज़े में है दुनिया समझ रही है कि लैला मज़े में है बर्बाद कर दिया हमें परदेस ने मगर मां...
सेहरा में रह के क़ैस ज़ियादा मज़े में है दुनिया समझ रही है कि लैला मज़े में है बर्बाद कर दिया हमें परदेस ने मगर मां...
लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं मय-कदा ज़र्फ़ के मेआ'र का...
जो चाहती दुनिया है वो मुझ से नहीं होगा समझौता कोई ख़्वाब के बदले नहीं होगा अब रात की दीवार को ढाना है ज़रूरी ये काम...
होंटों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी आँखों को...
भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है अगर सोने के पिंजड़े में भी रहता है...
क़लंदर संगमरमर के मकानों में नहीं मिलता मैं असली घी हूँ बनियों की दुकानों में नहीं मिलता तो फिर दुनिया में मेरे चाहने...
अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आइना हो जाऊँगा उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा ही...
किसे अपना बनाएँ कोई इस क़ाबिल नहीं मिलता यहाँ पत्थर बहुत मिलते हैं लेकिन दिल नहीं मिलता मोहब्बत का सिला ईसार का हासिल...
दिल में अब दर्द ए मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं ज़िंदगी मेरी इबादत के सिवा कुछ भी नहीं मैं तेरी बारगह ए नाज़ में क्या...
जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँ नहीं देते ख़त किस लिए रक्खे हैं जला क्यूँ नहीं देते किस वास्ते लिक्खा है हथेली पे मिरा...
दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ...
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो तुम्हारे बाद भला क्या हैं वादा-ओ-पैमाँ बस...