Shayaris Articles

तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो

तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो

हम ख़ुद किसी की आँख के तारे हैं इन दिनों

आंखों ने कैसे ख़्वाब तराशे हैं इन दिनों
दिल पर अजीब रंग उतरते हैं इन दिनों

हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते

रात के बाद सहर होगी मगर किस के लिए
हम ही शायद न रहें रात के ढलते ढलते

रात को ओढ़ के सो जाता हूँ

रात को ओढ़ के सो जाता हूँ दिन-भर की थकन
सुब्ह को फिर से कई काम पहन लेता हूँ