ऐ ख़ुदा मुझसे न ले मेरे गुनाहों का हिसाब
मेरे पास अश्क ए नदामत के सिवा कुछ भी नहीं
मस्ती बिना यारी कहाँ
जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँ नहीं देते
जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँ नहीं देते
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो
हम ख़ुद किसी की आँख के तारे हैं इन दिनों
आंखों ने कैसे ख़्वाब तराशे हैं इन दिनों
दिल पर अजीब रंग उतरते हैं इन दिनों
हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते
रात के बाद सहर होगी मगर किस के लिए
हम ही शायद न रहें रात के ढलते ढलते
रात को ओढ़ के सो जाता हूँ
रात को ओढ़ के सो जाता हूँ दिन-भर की थकन
सुब्ह को फिर से कई काम पहन लेता हूँ
उसी ने आग लगाई है सारी बस्ती में
उसी ने आग लगाई है सारी बस्ती में
वही ये पूछ रहा है कि माजरा क्या है
सरफिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
सरफिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं
हम पे जो बीत चुकी है वो कहाँ लिक्खा है
हम पे जो बीत रही है वो कहाँ कहते हैं
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