रात को ओढ़ के सो जाता हूँ

दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ मैं तिरी यादों का एहराम पहन लेता हूँ मेरे घर वाले भी तकलीफ़ में आ जाते हैं मैं जो कुछ देर को आराम पहन लेता हूँ रात को ओढ़ के सो जाता हूँ दिन-भर की थकन सुब्ह को फिर से कई काम पहन लेता हूँ जब भी परदेस में याद आता है घर का नक़्शा मैं...